ज़िन्दगी एक किताब सी है,जिसमें ढेरों किस्से-कहानियां हैं ............. इस किताब के कुछ पन्ने आंसुओं से भीगे हैं तो कुछ में,ख़ुशी मुस्कुराती है. ............प्यार है,गुस्सा है ,रूठना-मनाना है ,सुख-दुःख हैं,ख्वाब हैं,हकीकत भी है ...............हम सबके जीवन की किताब के पन्नों पर लिखी कुछ अनछुई इबारतों को पढने और अनकहे पहलुओं को समझने की एक कोशिश है ...............ज़िन्दगीनामा
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Friday, September 16, 2011
तुमसे मिल भी नहीं पाती ..
मन करता है ....
तुमसे मिलूँ ,ढेरों बातें करूँ
पर,फिर.........
ज़माने का डर
रोक लेता है मुझे .
इस भय को जो किसी तरह
मैं पार कर लेती हूँ ..
तो,मेरे कदम रोक लेती है
मेरी शर्म,मेरी ही हया
उसपे संस्कारों की बाधा
इतने तो बंधन हैं आज भी ..
फिर क्यूँ सब कहते हैं
कि वक्त बदल गया है.
स्वतंत्र है नारी ,
हर काम कि उसे है आजादी .
जबकि मैं तो बिना भय के
तुमसे मिल भी नहीं पाती
हरदम यही खटका
कि किसी ने देख लिया तो क्या होगा
बिना किसी अपराधबोध के
तुमसे प्यार भी नहीं कर पाती हूँ .
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