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Saturday, November 3, 2012

रहम-ओ-करम





आजकल ...............
मुझे लफ़्ज़ों की ज़रुरत कम पड़ने लगी है
क्यूंकि स्पर्शों की नयी दुनिया जगने लगी है
पता नहीं क्यूँ रतजगे इतने हसीं लगने लगे हैं
ख़्वाब हकीक़त में अचानक से बदलने लगे हैं

कौन सी आग है जिसमें जलने लगी हूँ
सारी कायनात में तुझे ही देखने लगी हूँ
तेरे हर अंदाज़ पे जीने और मरने लगी हूँ
क्या थी पहले अब तेरे साथ क्या होने लगी हूँ


अजीब सी एक मुश्किल है जिसमें धंसने लगी हूँ
प्रीत के इन धागों में अब मैं फंसने लगी हूँ
इन सब सवालों का मुझे जवाब नहीं मिलता
किसी बात का आजकल हिसाब नहीं मिलता.......तेरे रहम -ओ-करम पे ज़िंदगी

Sunday, September 23, 2012

उलाहना



तुमसे जो कहना था
कभी नहीं कहा .
तुमसे जो सुनना चाहा
वो तुमने नहीं कहा .
रिश्ता....हमारा
कोमल एहसासों की
नरम गर्माहट में बस ऐसे ही
पलता रहा...बढ़ता रहा .

तुम अपनी आशंकाओं में घिरे रहे
मुझे दुविधाओं से फुर्सत न मिली
नतीजा उसका यह हुआ
कि हम....
दूर हुए ..मजबूर हुए
अलग-अलग ज़िंदगी जीने को..

आसानी से हमारा संग-साथ
मुमकिन हो सकता था
आज जो सबसे बड़ा दुःख है
वो सबसे बड़ा सुख हो सकता था .
वो चाहते रहना और कह न पाना
सोचने बैठूं ...
तो मलाल सा होने लगता है
खुद पे और तुमपे भी गुस्सा आता है .
सामने हाथ बढाने की देर थी
तू मेरा हो सकता था .
ज़रा सी कोशिश,थोड़ी सी हिम्मत से
सब बदल सकता था.
पता है....इसीलिए अब
जब भी ख़्वाब आते हैं
उनमें भी हम एक दूजे को नहीं पाते हैं
वो सारे सपने भी अपने साथ
सिर्फ ढेर से उलाहने लाते हैं .

Friday, September 21, 2012

स्वीकारने के करीब



सामने जब तक वो रहा

लफ्ज़ भी न निकला मुंह से

वो बोलता रहा...

मैं सुनती रही.

खुली आँखों से

ख़्वाब बुनती रही .


जब सोचा

रात के ख़्वाबों की तामीर कर दूँ

आज अपने दिल कि सारी बातें कह दूँ .

बस कहने को लब हिले ही थे

मन में कुछ फूल खिले ही थे

कि उसने कहा

बातों बातों में वक्त का पता नहीं चला

साढ़े छह हो गए हैं

अँधेरा हो रहा है

मैं चलता हूँ

तुम भी अपने घर जाओ.


मेरे कहते ही कि कुछ कहना है

उसका हाथ हिला कर कहना

अभी चलता हूँ...

...कल फिर मिलते है

...तब सुनूँगा सब

जो भी तुम्हें कहना है .


बार-बार ऐसा ही होता है

मैं स्वीकारने के करीब होती हूँ

और तुम्हें ठीक उसी वक्त

कुछ काम याद आ जाता है .

Thursday, September 13, 2012

तुम पागल हो




कितना कुछ कहना था
कब से रुका हुआ था
अंदर दबा हुआ सा था
मन पे एक बोझा था
अकेले सहना मुश्किल था .
अब.....
सब बह गया है..
उतर गया है सब.

पाँव ज़मीन पे नहीं रहते
दिल उड़ने को करता है
तुमसे मिलने को करता है
सब कुछ तुम्हें दे कर
तुम्हें पा लेने को करता है
अजीब सा हो गया है कुछ
हर घडी न जाने क्या-क्या
ये जी करता है .
कुछ समझ नही आ रहा
किस राह जाने की
तैयारी है इसकी .

जुडना...
तुम्हारे हर सुख ...हर दुःख से
सुनना ...
बातें तुम्हारी कही-अनकही सी
रहना...
तुम्हारे ख़्वाब और ख्यालों में
चाहना...
तुम्हारा प्यार...तुम्हारा विश्वास
मांगना...
तुम्हारा साथ दिन रात
सच कहूँ ,तो.......

रास आ रहा है ये पागलपन मुझे
कि तुम्हारे मुंह से
"तुम पागल हो "सुनना अच्छा लगता है

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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