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Saturday, November 3, 2012

रहम-ओ-करम





आजकल ...............
मुझे लफ़्ज़ों की ज़रुरत कम पड़ने लगी है
क्यूंकि स्पर्शों की नयी दुनिया जगने लगी है
पता नहीं क्यूँ रतजगे इतने हसीं लगने लगे हैं
ख़्वाब हकीक़त में अचानक से बदलने लगे हैं

कौन सी आग है जिसमें जलने लगी हूँ
सारी कायनात में तुझे ही देखने लगी हूँ
तेरे हर अंदाज़ पे जीने और मरने लगी हूँ
क्या थी पहले अब तेरे साथ क्या होने लगी हूँ


अजीब सी एक मुश्किल है जिसमें धंसने लगी हूँ
प्रीत के इन धागों में अब मैं फंसने लगी हूँ
इन सब सवालों का मुझे जवाब नहीं मिलता
किसी बात का आजकल हिसाब नहीं मिलता.......तेरे रहम -ओ-करम पे ज़िंदगी

Wednesday, September 12, 2012

शुक्रिया....प्यार



एक तेरे आ जाने से
कितना कुछ आया है
मेरे जीवन में .

ढेर से डर हैं ...
तुझसे मिल नहीं पाने के .
रोज़ एक नयी आशंका
बिछड जाने की .
बातें ..
कही -अनकही
सरकारी दफ्तर की
पेंडिंग फाइलों सी....
खत्म ही नहीं होतीं .
रतजगे ...
जिनमें एहसासों के तार जुड़े .
आंसू,हँसी,....
इन सब के सिलसिले .

एक मुहब्बत के साथ
कितने सारे बदलाव आ जाते हैं जीवन में .
शुक्रिया,प्यार...
जीवन में यूँ दबे पाँव आने के लिए
हरेक शै पे यूँ छा जाने के लिए.

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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