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Sunday, August 23, 2015

हो तो क्या हो?

अच्छा किसी को गर इतना चाहा जाये .....
कि प्यार में डुब कर तरना आ जाये
उसपे मर कर जीना आ जाये
इतनी दूरी हो कि क़रीब आ जाये
इतना भूलें कि वो बेहद याद आये
मैं बन जाऊं जो धरती सी
तो वो झुका आसमान लगे
इतनी कठिन हो चीज़ें
कि बाक़ी सब आसान लगे
सच्चा लगे वो इस क़दर
कि दुनिया बेईमान लगे
आस पास सारे इंसान हैं वही रहे
और वो एक शख़्स भगवान लगे
......तो हो तो क्या हो????

Wednesday, April 25, 2012

दोष नियति का क्यूँ??????????


अनदेखे आसमान अपनी ओर यूँ खींचते हैं ..कभी-कभार
कि सुन नहीं पाते,हम
धरती की पुकार...महसूस नहीं कर पाते उसका प्यार
जो कहती है....रुक जाओ!! मत जाओ .
रिश्ते का गला घोंट के मारने से लेकर
ताबूत में कीलें लगा कर
उसके गाड़ने तक
हम नियति को दोषी नहीं ठहरा सकते
दोष ...अपना है
नितांत अपना
क्यूँ अपना किया
किसी और के सर डालने का एक और पाप लिया जाए .
यह नियति हमारी ....जो है ,जो हुई
उसके कारण भी हम है .
कभी ना कह पाना ..
ना सह पाना ..
अनदेखे डरों से डरते जाना ...
ले गया अपने साथ खुशनसीबी हमारी .
आज.
राहें हैं जुदा-जुदा हमारी .

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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