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Wednesday, April 18, 2012

ढाई आखर



तुम्हारे कहने से
शुरुआत करने बैठी हूँ
एक नए अध्याय की .
जीवन की स्लेट से
पिछला सारा लिखा
हटा कर,मिटा कर .

बीता वक्त
भूल बिसार कर .
लेकर बैठी हूँ
नयी किताबें...
जीवन जीने की कला
सिखाने वाली .

पर ,क्या करूं ???
समझ नहीं आ रहा....
मेरी तो वर्णमाला
उन ढाई आखरों तक ही सीमित है
उनसे आगे न कुछ जाना
ना कभी समझना चाहा है .
ढाई अक्षरों में सिमटे
अपने जीवन के इस ज्ञान
को आगे कैसे बढाऊं??
तुमसे परे अपनी सोच और समझ
कैसे और कहाँ ले जाऊं ???

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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