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Wednesday, August 29, 2012

बनी रहे ....



हसरत है कि मेरे शहर में ये शराफ़त बनी रहे
बहू -बेटी किसी की भी हों उनकी अस्मत बनी रहे

मैंने कुछ भी चाहा ही नहीं कभी बस इसके सिवा
हक़ में दुआएं करने वालों की बरक़त बनी रहे

कोई कसर तूने छोड़ी कहाँ सितम ढाने में ख़ुदा
तुम बता दो किसलिए तुझपे ये अक़ीदत बनी रहे

निगाहों को,दिलों को पढ़ने का फ़न किसे आता है
इन्हें बांचना सीख लूँ बस ये लियाक़त बनी रहे

अपने ही अपनों के ख़ून के प्यासे ना हो जाएँ
दूरी इस सूरते हाल से ताक़यामत बनी रहे

तरक्क़ी पसंद हूँ मैं इसमें कोई दो राय नहीं
देहलीज़ लांघ कर निकलूँ तो भी नज़ाकत बनी रहे

बिछड़ना जो पड़ जाए नसीब से हार कर कभी हमें
ज़रूरी है हम में रस्मे ख़तो क़िताबत बनी रहे

देखा सुना बहुत सीखा नहीं कुछ प्यार के सिवा
तमाम उम्र मुझ जाहिल की ये जहालत बनी रहे

कुछ भी ग़लत होता देखें तो आवाज़ बुलंद करें
मिजाज़ में सब लोगों के बस ये बग़ावत बनी रहे

(प्रकाशित)

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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