आजकल
बहुत मन हो रहा है
कि काश मैं सिगरेट बन जाऊं .
तुम्हारी कमीज़ की उस जेब में रहूं .
जो तुम्हारे दिल के करीब है.
तुम्हारी उँगलियों में फंसी रहूं
और होठों को छूती रहूं .
तसल्ली इस बात की
कि तुम्हारी टेंशन
तुम्हारी खुशी
हर में ...साथ रही .
मैं जलूं भी तो
इस बात का चैन कि
दम तोड़ा तुम्हारे करीब
तुम्हारे हाथों से राख हुई.
गंध मेरी
मेरे जाने के बाद भी रहे
तुम्हारी उँगलियों में
तुम्हारी साँसों में
तुम्हारे ज़ेहन में ...हमेशा.
काश ......
"आमीन" कहो न.
