कभी निन्यानवे पे गोटी हो
लग रहा हो मंजिल दूर नहीं
तभी अचानक किसी दूसरे को मिल जाती है सीढ़ी
और वो नीचे से सीधा चढ के आता है
करीब में कहीं
और किस्मत ने उसे जो चांस दिया होता है
सीढ़ी चढ़ने का......
उससे जब निन्यानवे पे रखी गोटी पीटता है
और फिर पीटने की चांस ले कर
पहुँच जाता है ,मंजिल तक.
तब,लगता है कि
इससे अच्छा होता
इतनी ऊपर आये ही न होते
जीतने के सपने खुद को दिखाए न होते.
बात..बस इतनी सी है
ज़रूरी नहीं हर की किस्मत
हर एक वक्त साथ दे.
अगर तय था तुमसे न मिल पाना
संभव नहीं था तुम तक पहुँच पाना
तो इतना तो लकीरें साथ दे ही सकती थी
कि मुझे ...अपनी मंजिल के इतने पास न लाती
मैं पहले ही खुद को सच्चाई के सांप से कटवा लेती
कोई भी ख्वाब कभी न सजाती .
फालतू की उम्मीदें बाँधकर
फिर उनके टूटने के दर्द के साथ
हार जाने का दुःख क्यूँ कर सहती .
किस्मत का सांप हमेशा ही बेवक्त डसता है.
