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Wednesday, December 5, 2012

इंतज़ार में




अक्सर
अपने घर के अकेलेपन में
महसूस होते हो तुम .

मैंने देखे हैं तुम्हारे होंठों के निशाँ
अपनी चाय की प्याली पे .
गीला तौलिया बिस्तर पे पडा
मुझको चिढाता हुआ.

सुनाई देती हैं मुझे मेरी आवाज़
जब दिखती हैं ,तुम्हारी चप्पलें
सारे घर में मटरगश्ती करती हुई .

तुम्हारी महक से पता नहीं कैसे
महकती हूँ मैं ...दिन और रात
आजकल यूँ ही
मुस्कुराती हूँ मैं...बेमतलब ,बेबात
बताओगे...?
ऐसा ही होता है क्या
किसी के इंतज़ार में .

Monday, August 6, 2012

इंतज़ार में....




अक्सर
अपने घर के अकेलेपन में
महसूस होते हो तुम .

मैंने देखे हैं तुम्हारे होंठों के निशाँ
अपनी चाय की प्याली पे .

गीला तौलिया बिस्तर पे पडा
मुझको चिढाता हुआ.

सुनाई देती हैं मुझे मेरी आवाज़
जब दिखती हैं ,तुम्हारी चप्पलें
सारे घर में मटरगश्ती करती हुई .

तुम्हारी महक से पता नहीं कैसे
महकती हूँ मैं ...दिन और रात

आजकल यूँ ही
मुस्कुराती हूँ मैं...बेमतलब ,बेबात

बताओगे...?

ऐसा ही होता है क्या
किसी के इंतज़ार में .

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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