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Monday, March 12, 2012

वक्त



आज, कुछ यूँ कर लेते हैं
तुम मिलने आना
तो यह घडी .
जो टंगी है न दीवार पे ...हटा दूंगी
तुम्हारे हाथ की घडी भी
.. छुपा के रख दूंगी कहीं .
हम लोगों के बीच
समय क्यूँ अपनी पैठ बनाए .
तुम्हारे आते ही...
यूँ भी...
वक्त की नब्ज़
बढ़ जाती है
मेरी धडकनों की तरह .

मुझे लगता है,
शताब्दियों से.........
प्रेम का सबसे बड़ा दुश्मन
यह मुआ वक्त ही है.

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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