Tuesday, August 16, 2011

मेरा अतीत

मैं बहुत चाहती हूँ मनमीत,
कि मेरा यह अतीत...
मेरे वर्तमान में आ-आ कर
यूँ न रुलाये मुझे बार-बार .
अतीत बन कर ही रहे सदा
काल की गति के साथ ही बहे...
समय सीमा का न करे उल्लंघन
न याद दिलाए वो"स्नेहिल बंधन"

समय सदा सबके लिए आगे ही बढ़ता है
पर,मेरे जीवन में क्यूँ ये लौट-लौट आता है???
कोई तो बताए,क्या करूँ मैं
इस पागल दिल का अपने
जो सुनता ही नहीं मेरी फ़रियाद
हमेशा करता है तुम्हें ही याद.


जब भी मैं तय करती हूँ,ये...
....कि तेरे दिल का मेरे दिल से
वो नाता कल से तोड़ लूंगी
उसे न फिर कभी जोडूगी .
तब,यह आने वाला कल
आगे ही बढ़ता जाता है,प्रतिपल
और... मैं ,उसका पीछा कर
बैठ जाती हूँ थक-हार कर .

मैं इंतज़ार ही करती रहती हूँ...
उस कल के लिए ही जीती हूँ ...
जब ,सही मायनों में
मैं तुम्हें भूल पाऊँगी
तुमसे अलग हो पाऊँगी .

वो कल आता ही नहीं ...
शायद,आगे भी न आये कभी
क्यूंकि
दिल के किसी कोने से
आज भी यही आवाज़ आती है
कि,
मैंने तुम्हें अपनी धडकन माना है
और
जब तक हैं सांसें मुझमें
तेरा प्यार रहेगा ज़िंदा मुझमें .

Friday, August 12, 2011

रोज़ मिलना...औपचारिकता ??


रोज़ ,तुम्हारा ...
मुझसे मिलना, बातें करना
हंसना-बोलना,साथ-साथ चलना
तुम्हें,अटपटा सा लगता है ,ये सब करना.
लगता है कि प्यार में ये कैसा दिखावा?
इन औपचारिकताओं की क्या आवश्यकता है ??
इन प्रदर्शनों में खुद को क्यूँ कर सीमित करना है ???

हमारी मित्रता तो यथार्थ के धरातल पर टिकी है.
वास्तविकता के आधार पर उसकी नींव टिकी है
शायद,इसीलिए ...
तुमने यह कहा मुझसे
कि
प्रेम तो मूक अभिव्यक्ति है...
बिन शब्दों के भी सब समझा जा सकता है
बिन मिले भी एक दूसरे को जाना जा सकता है
यही तो प्रेम की पहली सीढ़ी है...
"रोज मिलने से कहीं अच्छा है ,
कि जब ज़रूरत हो तब मैं तुम्हारे पास हूं.
ऐसे बात करने से क्या लाभ
कि जब तुम तन्हाई से घबराओ तब मैं न पास हूँ.
रोज साथ चलने से अच्छा है,ज्यादा
कि जब तुम गिरो तब संभालने को मेरा हाथ हो.

तुम्हारे कहे गए ये सारे वाक्य ,
रात दिन मुझे याद आते हैं.
पर,तुम्हारी कही इन बातों का क्या कोई फायदा है?
क्यूंकि क्या तुम यह बात नहीं समझते हो,
कि रोज बोलना शायद ज़रूरी न हो
पर बिन बोल क्या तुम समझ जाओगे
कब मुझे है क्या परेशानी,कब मुझे है ज़रूरत तुम्हारी
मात्र प्रेम के दृढ आधार के बाल पर जान पाओगे...सब?

जब मिल सकते हों
तब भी रोज मिलना,साथ चलना आवश्यक नहीं
पर एक बात बता दो फिर,कि
क्या तुम्हारे पास है वो शक्ति,
कि बिन मेरे साथ चले ही
ठोकर कहाँ लगी,कहाँ मैं गिरी
तुम जान जाओगे....??

चलो,मैंने...इस सत्य को स्वीकार लिया
कि अनूभूतियों का,भावनाओं का अपना मोल है
पर ,यह जो व्यवहारिक दुनिया है ...इसका क्या ?
मेरे...तुम्हारे जैसे इंसानों में
अंतर्यामी होने का गुण है क्या?
जो बिन कहे,मिले हम सब जान -समझ लें.
बिन मिले,बोले,साथ चले
ज़रूरत के समय चाह कर भी ...
साथ नहीं दे पायेंगे...
पता कैसे चलेगा कि ..
कौन कब खुश है,रुष्ट है...या कोई कष्ट है.

तुम भी तो कहते हो भावनाओं से ही इंसान ...इंसान बनता है
फिर उसे दिखाने में शर्म कैसी और क्यूँ ?
मुझे इंसान रहने दो...मशीन मत बनने दो
क्षुद्र इंसान हूँ मैं,यह मत भूलो
प्रेम यूँ तो इन सबसे उपर है
पर इसके पोषण में यही छोटी बातें,मुलाकातें
अपना योगदान देती हैं .
ये एक-एक इकाई ही जब जुड़ती है
प्रेम नवीन होता जाता है
ठहराव से बचता है
बिना अवरोध बहता जाता है

Monday, August 8, 2011

अब हूँ.....तुम्हारे साथ


तुम्हारे हाथ में
मेरा हाथ सौंपा गया
और मैं,तुम्हारा हाथ थाम
तुम्हारे जीवन में आ गयी.
अनजाने में ही...
अपने पीछे के सारे दरवाज़े
लौट जाने के सारे रास्ते
खुद ही बंद कर आई .
अब,हूँ...तुम्हारे साथ
तुम्हारे किये झूठे वादों,
तुम्हारी ली झूठी कसमों
अपने टुकड़े हुए विश्वास
रुंधी हुई प्यार की आवाज़
की....
अर्थी को ढोते...हुए

Friday, August 5, 2011

जल ही जीवन है

पानी ही जीवन है
सब जानते हैं
सब मानते हैं.
पर,जब वही पानी
बहता है मद्धम-मद्धम
तुम्हारी आँखें करके नम
तब,
पता नहीं क्यूँ ...??कैसे??
भीग जाता है मेरा भी मन .
अजीब सी उलझन होती है
गला रुंध जाता है.
उस वक्त ....
यह पानी ,
जीवन का पर्याय नहीं लगता
पानी का यह रूप ...
बिलकुल भी
अच्छा नहीं लगता .

Wednesday, August 3, 2011

बौराये से ..

तुम आये जीवन में
और..................
बदल गया है
मेरे दिल का मौसम
सावन ही सावन है ...आजकल ,यहाँ

अलसाई सुबहें..
मदहोश रातें हैं .
नशीले बातें....
प्यार की बरसातें हैं .
थिरकती हवाएं ....
गुनगुनाती फिजाएं हैं.
टूटती बंदिशें...
गाती हुई धडकनें हैं.
बहकती सांसें है
सुरमयी से लम्हें हैं .
यह सब मेरे अपने हैं
और
इनके साथ हैं
बौराये से
मैं और तुम ..................

सच,कहना...
लगता है न
कि जब से हम मिले हैं
सावन है...
नेह की घटायें हैं
जिनसे इश्क बरसता है
नशे के साथ मिला हुआ

भीगे से...बहके से...दहके से "हम"

Saturday, July 30, 2011

मेरी बेवफाई

.
शाम को आज एक मीटिंग थी
मैं भी वहाँ मौजूद थी
मेरे सामने बैठे
एक सज्जन ने
जेब से सिगरेट निकाली,
सुलगाई ...
इस सुलगी सिगरेट ने
मेरे दिल के भीतर भी
न जाने क्या-क्या सुलगाया .
जब वो धुंआ छोड़ने लगे
मेरी आँखों से अश्क गिरने लगे
धूल भरे यादों के वरक धुलने लगे .
एक बीती कहानी साफ़ हो गयी
जो चाह के भी मैं नहीं भूल पायी

तुम्हारी याद चली आई
साथ उसके मेरी बेवफाई..
मेरी बेरुखी से तुम्हारे दिल के
सभी अरमान धुआं हुए थे
उन जज्बातों की जलती चिता का धुंआ
हम दोनों की आँखों में भर गया था
उसकी राख ...
तुमने तो विसर्जित कर दी ,शायद
पर,आज तक उस राख को दिल में लिए जी रही हूँ.
जिस ज़माने के डर से तब "न" कहा था
उसी ज़माने के डर से आज भी
नाखुश होते हुए भी
खुश होने का अभिनय कर रही हूँ.
दिल की बर्बादी के गम को पीकर
कामयाबी का जश्न मना रही हूँ
मेरे अपने केवल"तुम"थे
तुम्हे ही दुःख देकर
गैरों के साथ मस्ती के जाम टकरा रही हूँ.
तुमको दगा देकर आज भी जिंदा हूँ
अपने इस जीने पे बहुत शर्मिन्दा हूँ

Monday, July 25, 2011

दस वर्ष ...

....

दस वर्षों का एक लंबा अंतराल
उसके बाद
तुमसे यूँ मिल पाना .
आज लगा कि ....
वो दस साल
जो बीत गए...वो गुज़रे नहीं
वह ठहर गए थे हमारे बीच .
बह गए....
तुम्हारी एक छुअन से.
ढह गयी...
अहं की सारी दीवारें .
पिघल गए....
चुप्पी के दर्द जो जम गए थे .
मैं और तुम से हम दोनों
फिर .....
एक बार हो गए है "हम".

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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